रेलवे और टकराव

रेलवे और टकराव

ममता बनर्जी की ख्याति हठी, संघर्षशील और ‘एकला चलो रे’ मिजाज वाली राजनेता की है. इसीलिए खास तौर पर पश्चिम बंगाल की जनता को उनसे काफी उम्मीदें हैं और कई विश£ेषकों का मानना है कि इस लोकसभा चुनाव की सफलता को अगले विधानभा चुनाव में दोहरा कर वे राज्य में चिर-प्रतीक्षित सत्ता परिवर्तन को आकार दे सकती हैं. जाहिर है कि अगले दो साल उनके राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक महत्व के हैं. इस बीच बतौर राजनेता उनसे कहीं ज्यादा संतुलन और दूरदर्शिता की अपेक्षा की जाती है. रेल मंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी किसी न किसी रेलवे संबंधी निर्णय की वजह से लगातार चर्चा में हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश, इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनमें पिछले रेल मंत्री से खुन्नस निकालने का भाव नजर आता है. रोजाना 100 किलोमीटर तक की यात्रा करने वाले अत्यंत गरीब रेलयात्रियों के लिए 20 रुपए महीने का रेलवे पास पिछले रेल मंत्री लालू यादव की तमाम गरीब समर्थक योजनाओं की अगली कड़ी माना जा सकता है. लेकिन रेलवे की जमीन का अतिक्रमण हटाने गए अधिकारियों का ममता के निजी आदेश पर तबादला, रेलवे को मुनाफे में लाने के उपायों को वाणिज्यिक हितों से संचालित बताकर इनका संतुलन जनहितकारी योजनाओं से बिठाने की बात कहना और पूर्व रेल मंत्रियों और उनके सहायकों के लिए आजीवन पास जारी करने संबधी लालू यादव के अंतिम फैसले को पलटने का इरादा जाहिर करना यही बताता है कि ममता बनर्जी के सबक सिखाऊ एजेंडे पर सीपीएम के अलावा लालू यादव भी हैं. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. बतौर रेल मंत्री लालू यादव के कुछ फैसले ममता बनर्जी को काफी नागवार गुजरे थे और उन पर पश्चिम बंगाल में उन्होंने बड़े आंदोलन भी किए थे. लेकिन समय बीतने के साथ पुरानी कटुताएं भुला देने की कला ममता बनर्जी अब नहीं तो आखिर कब सीखेंगी? भारतीय रेल देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक उपक्रम है. करोड़ों लोगों, अरबों टन सामानों के यातायात के अलावा लाखों परिवारों की रोजी-रोटी भी इससे चलती है. इतने बड़े संस्थान के संचालन में अगर नए और पुराने रेलमंत्रियों के अहं का टकराव थोड़ी भी भूमिका निभाने लगा तो इससे देश का बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है. ममता बनर्जी को यह भी समझना होगा कि उनकी सरकार पिछली यूपीए सरकार का ही जारी रूप है और जनता ने इसकी पिछली नीतियों पर सहमति की मुहर लगाकर ही इसे पहले से बड़ा जनादेश दिया है. ऐसे में उन्हें बतौर रेलमंत्री अपनी छाप पिछली सफल नीतियों का खंडन करके नहीं बल्कि उनके बेहतर क्रियान्वयन के जरिए छोडऩी चाहिए.

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