आरआरबी के भर्ती घोटाले को एसडीजीएम/उ.म.रे. ने दबाया मामला सीबीआई को भेजा गया

आरआरबी के भर्ती घोटाले को
एसडीजीएम/उ.म.रे. ने दबाया
मामला सीबीआई को भेजा गया

इलाहाबाद : विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 11 मई 2008 को रेलवे भर्ती बोर्ड (आरआरबी) इलाहाबाद द्वारा असिस्टेंट लोको पायलट की भर्ती के लिए ली गई परीक्षा में तत्कालीन चेयरमैन/आरआरबी, इलाहाबाद के भयंकर घोटाले को उ.म.रे. के वरिष्ठ उप महाप्रबंधक एवं चीफ विजिलेंस ऑफीसर (एसडीजीएम /सीवीओ) ने दबा दिया है. यही नहीं सूत्रों का कहना है कि इस मामले को उनके संज्ञान में लाने वाले डिप्टी सीवीओ और मामले को उजागर करने वाले सीवीआई को भी रिपैट्रिएट करा दिया है. तथापि सूत्रों का कहना है कि अब यह मामला सीबीआई को पता चल गया है और वह इसकी जांच करने में जुट गई है.
प्राप्त जानकारी के अनुसार आरआरबी, इलाहाबाद ने 15 मई 2008 को असिस्टेंट लोको पायलट के चयन की मुख्य परीक्षा ली थी. परीक्षा के दौरान एक परीक्षा केंद्र में फ्लाइंग स्क्वॉड और विजिलेंस इंस्पेक्टरों ने देखा कि कुछ कंडीडेट अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में कुछ नहीं लिख रहे हैं. उन्होंने देखा कि यह कंडीडेट्स अपनी परीक्षा पुस्तिकाओं (ओएमआर सीट्स) में एकाध सवाल का उत्तर लिखकर चुपचाप बैठे हुए थे. एक विजिलेंस इंस्पेक्टर ने खाली और चुपचाप तथा बिना कुछ लिखते हुए बैठे इन कंडीडेट्स के रोल नंबर्स तभी नोट कर लिए थे.
आरआरबी द्वारा उक्त परीक्षा के परिणाम जब 30 नवंबर 2008 को घोषित किए गए तो उक्त चीफ विजिलेंस इंस्पेक्टर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जो कि बिना कुछ लिखे और कोरी ओएमआर सीट लिए परीक्षा हॉल में बैठे पाए गए थे, वही सारे कंडीडेट्स इसमें पास घोषित किये गये थे. उसने परीक्षा के दौरान नोट किए गए उनके रोल नंबरों से इसकी पुष्टि की और तत्काल ऐसे सभी कंडीडेट्स की ओरिजनल ओएमआर सील करके जब्त कर लीं. उसने इसका मिलान रेलवे बोर्ड के पास उपलब्ध ओएमआर की सेकेंड सीट से भी करके इस फ्रॉड को और भी पुख्ता किया. बताते हैं कि ओएमआर की दोनों सीटें आपस में मैच नहीं कर रहीं थीं. इससे यह साफ जाहिर हो गया कि ओएमआर की टॉप सीट परीक्षा के बाद बदली गई थी.
‘रेलवे समाचार’ को ऐसे कुछ कंडीडेंट्स के नाम और रोल नंबर भी पता चले हैं, जो इस फ्रॉड में शामिल थे और बाद में पास घोषित किए गए हैं. इन कंडीडेट्स के प्राप्त नाम और रोल नं. निम्नलिखित हैं:
क्रम कंडीडेट्स का नाम रोल नं.
1. गजेंद्र सिंह 23071225
2. के. अब्बास जैदी 23070949
3. राम निवास 23070786
4. विवेक पांडेय 23071686
5. नरेंद्र के. यादव 23071859
6. संदीप कुमार 23071858
सूत्रों का कहना है कि उक्त चीफ विजिलेंस इंस्पेक्टर (सीवीआई) ने यह मामला अपने डिप्टी सीवीओ श्री अत्रि की जानकारी में डाला था. सूत्रों का कहना है कि श्री अत्रि ने इससे एसडीजीएम/सीवीओ आलोक गुप्ता को जब अवगत कराया, तो बताते हैं कि श्री गुप्ता ने यह कहते हुए कि इसमें कुछ नहीं है, खबर गलत है, श्री अत्रि से इस मामले में कुछ नहीं करने तथा इसे पूरी तरह बंद कर देने के लिए कहा था. परंतु चूंकि यह मामला अत्यंत गंभीर था, इसलिए श्री अत्रि ने श्री गुप्ता की बात (हिदायत) को अनसुना करके इसे सीबीआई को भेज दिया था. सूत्रों का कहना है कि अब इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा की जा रही है.
जबकि सूत्रों का कहना है कि श्री गुप्ता को ही तत्काल इस मामले से रेलवे बोर्ड और सीवीसी अथवा सीधे सीबीआई को अवगत कराना चाहिए था, परंतु उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि वह अपने कैडर बिरादरी और तत्कालीन चेयरमैन/आरआरबी, इलाहाबाद पी. के. सांघी को बचाना चाहते थे. सूत्रों का कहना है कि श्री गुप्ता और श्री सांघी दोनों 1984 बैच के बैचमेट और आईआरएसईई अधिकारी हैं, और दोनों की दांत काटी रोटी (गहरी दोस्ती) है तथा दोनों ही एक-दूसरे के हर प्रकार के कदाचार में सहभागी हैं. सूत्रों का यह भी कहना है कि फर्जी और मेनीपुलेटेड भर्तियों से होने वाली कमाई तत्कालीन चेयरमैन, आरआरबी, इलाहाबाद द्वारा एसडीजीएम/उ.म.रे. के साथ बांटी जाती थी. क्योंकि एसडीजीएम भी अपने कंडीडेट्स को पास करने की सिफारिशें किया करते थे. सूत्रों ने तो यह भी आशंका जताई है कि हो न हो पकड़े गए यह कंडीडेट्स भी एसडीजीएम/उ.म.रे. से ही संबंधित हों, और शायद इसीलिए उन्होंने इस मामले को न सिर्फ गंभीरता से नहीं लिया बल्कि मामला उजागर करने वाले दोनों विजिलेंस अधिकारियों को भी तुरंत रिपैट्रिएट करा दिया?
सूत्रों का कहना है कि यही वजह थी कि उनके मना करने के बावजूद सीबीआई को यह मामले भेज देने वाले अपने डिप्टी सीवीओ (श्री अत्रि) को उन्होंने समय से पहले कैडर में वापसी को मैनेज करके उनका ट्रांसफर आरडीएसओ में करवाया. यहीं नहीं उन्होंने संबंधित सीवीआई, जिसने वास्तव में मामले को पकड़ा और उजागर किया था, को भी उसके विभाग में निर्धारित कार्यकाल से पहले ही रिपैट्रिएट कर दिया.
सूत्रों का कहना है कि यह एक गंभीर फ्रॉड का मामला है, जिसमें स्पष्ट रूप से एसडीजीएस/उ.म.रे. आलोक गुप्ता ने आरआरबी/इलाहाबाद के तत्कालीन चेयरमैन और अपने बैचमेट एवं कैडर बिरादरी पी. के. सांघी का फेवर किया है और उन्हें बचाया है. सूत्रों का कहना है कि श्री गुप्ता एक बहुत भ्रष्ट अधिकारी हैं जो कि उ.म.रे. के इले. विभाग सहित सभी विभागों की विभागीय चयन समितियों पर दबाव डालकर अपने कंडीडेट्स को पास करवाते रहे हैं. जबकि रेल अधिकारियों को कहना है कि इस मामले की गहराई से जांच की जाए और इस पर श्री गुप्ता के खिलाफ कड़ी अनुशासनिक कार्रवाई की जानी चाहिए. उनका यह भी कहना है कि आलोक गुप्ता जैसे महाभ्रष्टों को एसडीजीएम जैसी महाअधिकार संपन्न और प्रोटेक्टेड पोस्ट पर कभी पोस्टिंग नहीं दी जानी चाहिए.
उ.म.रे. के अधिकारियों का कहना है कि अभी कुछ समय पहले श्री गुप्ता ने इंजी. विभाग के ग्रुप ‘बी’ सेलेक्शन में पास हुए कंडीडेट्स के पैनल को जानबूझकर 10-15 दिन तक इसलिए अपना क्लीयरेंस देने में देरी की थी, क्योंकि जिससे फेल हुए कंडीडेट अदालत से उक्त पैनल के खिलाफ स्टेआर्डर लाने में कामयाब हो जाएं. इन अधिकारियों का यह भी कहना है कि इसके लिए फेल कंडीडेट्स द्वारा श्री गुप्ता को एक मोटी राशि प्रदान की गई थी, जबकि सूत्रों का यह भी कहना है कि आरआरबी/इलाहाबाद के तत्कालीन चेयरमैन ने एएसएम की चयन परीक्षा में भी भारी घपला किया था. यह मामला भी शीघ्र सीबीआई को भेजा जा रहा है, तथापि उपरोक्त सभी प्रकरणों के पुख्ता सबूत ‘रेलवे समाचार’ के पास सुरक्षित हैं. इन सब विषयों पर जब आलोक गुप्ता एवं पी. के. सांघी, जो कि उ.रे. में पदस्थ हैं, से मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनसे संपर्क नहीं किया जा सका क्योंकि उनके मोबाईल संपर्क से बाहर थे.

–‘रेलवे समाचार’

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