रुक सकती हैं पीछे की टक्कर से होने वाली दुर्घटनाए, बशर्ते कि…

रुक सकती हैं पीछे की टक्कर
से होने वाली दुर्घटनाए, बशर्ते कि…

भारतीय रेल में पीछे की टक्कर (रियर इंड कोलिजन) से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है और इसके लिए ट्रेन ड्राइवरों/गार्डों को जिम्मेदार ठहराकर मानवीय भूल से होने वाली दुर्घटना के खाते में डाला जा रहा है, जबकि इसके लिए उच्च स्तरीय रेल अधिकारियोंं की अदूरदर्शिता और मनमानी तथा अपने उत्तरदायित्व से पल्ला झाडऩे एवं उनकी अनुभवहीनता जिम्मेदार है. भारतीय रेल में यह जो मनमानी कामकाज चल रहा है और बंद वातानुकूलित कमरों में बैठकर जो लोग नीतियां निर्धारित कर रहे हैं, वास्तव में वही लोग इन दुर्घटनाओं के लिए उत्तरदायी हैं, क्योंकि उन्हें फील्ड की बदली हुई स्थितियों का न तो कोई भान है और न ही कोई अनुभव है.
उल्लेखनीय है कि रियर इंड कोलिजन ज्यादातर ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन में होता है, जबकि फील्ड में कार्यरत कई ऑपरेटिंग अधिकारियों का कहना है कि एब्सोल्यूट ब्लॉक सेक्शन में यह रियर इंड कोलिजन संभव नहीं है. इन अनुभवी ऑपरेटिंग अधिकारियों का मानना है, और जोर देकर कहना है कि जब भी घना कोहरा सीजन शुरू होता ही, उस पूरे सीजन के दौरान जहां भी घना कोहरा पड़ता है, उस क्षेत्र के संपूर्ण ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन को एब्सोल्यूट ब्लॉक सेक्शन में बदल दिया जाना चाहिए. इससे ऐसी दुर्घटनाएं नहीं होंगी और इस तरह करोड़ों रुपये की रेल संपत्ति एवं यात्रियों के कीमती जान-माल के नुकसान को बचाया जा सकता है.
इन ऑपरेटिंग अधिकारियों का निश्चित रूप से यह मानना है कि ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन बनाये जाने से कुछ उच्च सिग्नल एवं दूरसंचार अधिकारियों को लाखों करोड़ों का फायदा होता है. इन ऑपरेटिंग ऑपरेटिंग अधिकारियों का कहना है कि ऑटोमेटिक ब्लॉक सेक्शन वहां कामयाब होता है जहां गाडिय़ों की गति 300 किमी. प्रतिघंटा से ज्यादा होती है, जहां ऊंचा-नीचा ट्रैक नहीं है, जहां घुमावदार ट्रैक नहीं है, जहां कोहरा नहीं पड़ता है और जहां पढ़े-लिखे एवं पूरी तरह से प्रशिक्षित एवं सतर्क रनिंग स्टाफ कार्यरत होता है. जबकि भारतीय विषम पर्यावरणीय परिवेश में मौसम का मिजाज प्रत्येक 50-100 किमी पर अलग होता है, उपरोक्त में से कोई भी विसंगति ऐसी नहीं है, जो कि देश के किसी न किसी क्षेत्र में पूरे साल मौजूद न रहती हो. यहां किसी क्षेत्र में शायद ही कोई ट्रैक 100-200 किमी तक एकदम सीधा होता है. ऐसे में यह ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन की प्रणाली यहां कैसे कामयाब हो सकती है?
उल्लेखनीय है कि दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे के नागपुर डिवीजन में पूरा ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन बनाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी. परंतु डिवीजन में मात्र सीनियर डीएसओ की रिपोर्ट पर यह सारा काम रोक दिया गया, जबकि इस
पूरे प्रोजेक्ट पर वहां अब तक 18 करोड़ रु. से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं, तथापि सीनियर डीएसओ की रिपोर्ट पर रेलवे बोर्ड को भी यह पूरा प्रोजेक्ट स्थगित करने पर मजबूर होना पड़ा है. कुछ परिचालन विशेषज्ञों का मानना है कि संपूर्ण भारतीय रेल के लिए ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन अनुकूल नहीं है, परंतु कुछ उच्च एस एंड टी अधिकारियों एवं बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साठगांठ के चलते सैकड़ों करोड़ रुपये ऐसे प्रोजेक्ट पर फूंके जा रहे हैं जो कि भारतीय रेल और इस देश के वातावरण एवं मौसम के अनुकूल नहीं हैं.
हालांकि कुछ अधिकारियों का यह भी कहना है कि ऐसा नहीं है कि ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन भारतीय रेल के बिल्कुल ही अनुकूल नहीं है, परंतु अब तक जो दुर्घटनाएं हुई हैं, वह ऐसे ही सेक्शनों में हुई हैं, जिससे इनकी अनुकूलता के प्रति सवाल उठना स्वाभाविक है. उनका भी यह मानना है कि घने कोहरे और ऊबड़-खाबड़ ट्रैक वाले क्षेत्रों में ऑटोमैटिक ब्लॉक सेक्शन बनाना गैरजरूरी है. उनका मानना है कि कोई भी सिस्टम कितना ही कारगर और बेहतर हो, फिर भी उसे लगाये जाने से पहले भारतीय परिवेश में क्षेत्रीय मौसम अनुकूलता के अनुसार ही उसकी परख एवं अनुकूलता को देखा जाना चाहिए. यदि वह इसके अनुकूल नहीं है तो वह फिर चाहे कितना ही कारगर, कामयाब और बेहतर हो, उसकी यहां कोई उपयोगिता साबित नहीं हो सकती है.
हर साल बजट भाषण में रेलमंत्री द्वारा और विशेष अवसरों पर जोनल महाप्रबंधकों द्वारा भारतीय रेल में दुर्घटनाएं कम होने के आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं, परंतु आजादी के बीते इन 62 सालों में यह आंकड़े कम-कम होते हुए भी शून्य स्तर पर नहीं लाये जा सके हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि यह सारी आंकड़ेबाजी झूठी और जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली है. आज भी रेल अधिकारियों और रेलमंत्री द्वारा यह स्वीकार किया जाता है कि 90 प्रतिशत रेल दुर्घटनाएं मानवीय भूल से होती हैं, तो मानवीय भूल का स्तर भी आज तक कम क्यों नहीं हो पाया है? इसे कम करने के लिए पिछले 62 सालों में और रेलवे के 150 वर्षों के इतिहास में उन्होंने क्या किया है, यह कम क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या इसमें लगे मानव संसाधन के प्रशिक्षण और कार्यप्रणाली में खामी है अथवा उसके अधिक वेतन-भत्तों का रोना रोनेवाले उनके प्रशासनिक अधिकारियों की सोच में कोई गड़बड़ी है? आखिर कथित मानवीय भूल से होनेवाली ये रेल दुर्घटनाएं क्यों नहीं रुक रही हैं?
क्या इसका एकमात्र कारण ऊपरी स्तर पर फैला भ्रष्टाचार ही है? इस बारे में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. वरना इस देश में जिस तरह लगातार मौसम बदलता जा रहा है और जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है तथा भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, उससे आगे आने वाले समय में स्थितियां और भी जटिल हो जाने वाली हैं.

‘रेलवे समाचार’

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